जैसे-जैसे लोकसभा के लिए होने वाले आम चुनावों का समय नज़दीक आता जा रहा है, वैसे-वैसे यह बहस बढ़ती जा रही है कि क्या ’आम आदमी पार्टी’ भारतीय राजनीति का चेहरा बदल सकती है और भारतीय राजनीतिक मंच पर तीसरी ताक़त के रूप में उभर कर सामने आ सकती है।इस बात पर विचार करने के लिए ख़ुद पार्टी का नाम ’आम आदमी पार्टी’ भी लाखों-करोड़ों लोगों का प्रतिनिधि होने के तथ्य को अभिव्यक्त करता है।
दिल्ली की विधानसभा के लिए हुए चुनाव में जब ’आम आदमी पार्टी’ को काँग्रेस की सिर्फ़ 8 सीटों के मुक़ाबले 28 सीटें मिलीं तो यह एक सनसनीखेज ख़बर बन गई। यह बात बहुत से लोगों की समझ में ही नहीं आई कि कैसे दिल्ली की मुख्यमन्त्री शीला दीक्षित अरविन्द केजरीवाल जैसे राजनीति में आए किसी नए चेहरे से बुरी तरह चुनाव हार सकती हैं।
लेकिन अन्य दलों के राजनीतिक नेताओं के बीच असन्तोष पैदा होने के बावजूद ’आम आदमी पार्टी’ की लोकप्रियता दिन दूनी रात चौगुनी गति से बढ़ती जा रही है। 26 जनवरी तक ’आम आदमी पार्टी’ के सदस्यों की संख्या एक करोड़ तक पहुँचाने का जो लक्ष्य पार्टी नेताओं ने उठाया है, वह काल्पनिक नहीं लग रहा है। आम चुनाव होने में अभी तीन महीने से भी ज़्यादा समय बाकी है। तब तक तो पार्टी अपने आधार को बेहद मज़बूत कर सकती है।
इस तरह, इसमें कोई शक नहीं कि आम चुनाव के बाद बनने वाली नई संसद में ’आम आदमी पार्टी’ एक प्रभावशाली पार्टी बनकर उभरेगी। भारतीय राजनीति में उसकी सफलता अपने झण्डे गाड़ देगी। ’आम आदमी पार्टी’ की इस सफलता का आख़िर कारण क्या है? सबसे पहली बात तो यह है कि ’आम आदमी पार्टी’ ने जिस मुद्दे को उठाया है, वह मुद्दा ही उसकी पहचान बन गया है और आम चुनाव में भी उसे इसी मुद्दे की वज़ह से सफलता हासिल होगी। संसद में जीतकर आने और सरकार बनाने का दावा करने वाली सभी तीनों ताक़तें एक आवाज़ में देश में फैले भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ने की ज़रूरत की बात कर रही हैं। लेकिन जब काँग्रेस के नेता भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ने की बात करते हैं तो मतदाताओं के चेहरे पर एक व्यंग्यात्मक मुस्कान दिखाई देती है। मतदाता कहता है -- भई, बीते पाँच साल में तुम कहाँ थे, जब काँग्रेस सत्ता में थी? भारतीय जनता पार्टी के नेता जब भ्रष्टाचार से लड़ने की बात करते हैं तो जनता उनकी बातों पर भी विश्वास नहीं करती क्योंकि भारतीय जनता पार्टी भी पहले कई बार सत्ता में आ चुकी है और देश में भ्रष्टाचार लगातार बढ़ता ही चला गया है। इसलिए जब ’आम आदमी पार्टी’ के नेता भ्रष्टाचार मिटाने की बात करते हैं तो जनता पर इसका भरपूर असर होता है। आख़िर ’आम आदमी पार्टी’ तो कभी सत्ता में रही नहीं है, इसलिए उसके नेताओं पर विश्वास किया जा सकता है।
लेकिन ’आम आदमी पार्टी’ की सफलता उसके द्वारा चुने गए उचित मुद्दे और सिर्फ़ उसके सफल नारों पर ही निर्भर नहीं करती। हर चुनाव में परम्परागत राजनीतिज्ञों के वायदों और उत्थान से जनता थक चुकी है। ये राजनीतिज्ञ चुनाव जीत कर आते हैं और चुनाव जीतने के बाद जनता से कटकर रह जाते हैं। वे ऊँची जाति के राजनीतिज्ञ बन जाते हैं और जनता जैसे उनके लिए अछूत हो जाती है। इसीलिए भारत की जनता परम्परागत रूप से भारत में सक्रिय काँग्रेस और भारतीय जनता पार्टी का विकल्प ढूँढ़ना चाहती है।
अब भारतीय राजनीति के मंच पर तीसरी ताक़त के उदय से भारत की राजनीति में नई जान पड़ जाएगी तथा लोकतन्त्र में भारतीय मतदाता का विश्वास फिर से मज़बूत हो जाएगा।

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